जो भरा नहीं है भावों से बहती जिस में रसधार नहीं
वह ह्रदय नहीं वह पत्थर है,जिस में स्वदेश का प्यार नहीं.
-: मैथिलीशरण गुप्त
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Friday, July 30, 2010
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